सरहदों में बंट चुकी ये दुनिया कभी आदर्श नहीं होगी

दिलीप कुमार पाठक
लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था - 'हमारे देश में एक से बढ़कर एक महान विभूतियों ने जन्म लिया है. लेकिन जब आप भारत से बाहर जाते हैं तो आपको पता चलेगा भारत को भारत के बाहर गाँधी जी, स्वामी विवेकानंद, गुरु रवींद्रनाथ टैगोर, पंडित नेहरू जी जैसी महान विभूतियों के कारण ज्यादा पहिचाना जाता है. भारत की असल सम्पति ऐसे महापुरुषों के विचार ही हैं, जिनका अनुशरण पूरी दुनिया कर रही है... हम से कई लोग इसलिए ही जानते हैं कि है कि गुरु टैगोर ने हमारा राष्ट्रगान लिखा है, लेकिन उन्होंने बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी लिखा है. वहीँ श्रीलंका का आधा राष्ट्रगान भी गुरु टैगोर के एक गीत पर आधारित है. गुरु टैगोर एक विश्वविख्यात कवि थे, लेकिन सच्चाई यह है कि उनकी तरह मेधावी लोग इस दुनिया में कम ही हुए हैं. साहित्य की जितनी भी विधा हैं, सारी की सारी विधाओं में गुरु टैगोर पारंगत थे... चाहे कविता हो, गीत - संगीत, नाटक, नृत्य, मंचन, पेंटिग, उस दौर में विश्व भ्रमण करते थे. जिस दौर में लोग ढंग से अपना मुल्क ही नहीं घूम सकते थे, तब गुरु टैगोर ने लगभग दुनिया के 40 देशों की यात्राएं की थीं. गुरु टैगोर एशिया के पहले गणमान्य व्यक्ति थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नोबेल पुरस्कार विजेता गुरु टैगोर के पास वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय काव्य संग्रह हैं, एक विश्वस्तरीय पेंटर के पास 2300 से भी ज्यादा उनके द्वारा उकेरी गईं पेंटिग थीं. 2200 से ज्यादा उनके लिखे गीत थे, समाज सुधारक होने के साथ ही, महान क्रांतिकारी भी थे.
जब हमारे देश में ग़ुलामी के दौर में राष्ट्रवाद की भावना चरम पर थी, तब टैगोर विश्व हमारा परिवार वसुधैव कुटुम्बकम जैसी विचारधारा के हिमायती थे. रईस बंगाली परिवार में पैदा होने वाले गुरु टैगोर के अंदर इतनी संवेदनाएं केवल उनके साहित्य सृजन के कारण ही नहीं आईं थीं. गुरु टैगोर 1861 में ब्राम्हण परिवार में पैदा हुए थे, जिनका खानदान रईस था. उनके दादा जी के पास बहुत बड़ा बिजनैस था, लेकिन उनके पिताजी बहुत ही ज़्यादा आध्यात्मिक थे, जिसका उनकी ज़िन्दगी में काफ़ी असर रहा. गुरु टैगोर के पिताजी अपनी आध्यात्मिक दुनिया में काफी व्यस्त थे. माँ बीमार रहतीं थीं. जहां टैगोर की नौकरों के द्वारा ही देखरेख हुई, गुरु टैगोर ने इसे नौकरतंत्र कहा था, जो उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं था. ब्राम्हण होने के बाद भी उन्हें उनकी पुस्तैनी संपत्ति के कारण उन्हें ठाकुर कहा जाने लगा, अंग्रेजी सत्ता का दौरा था तब अंग्रेजों के सही से उच्चारण नहीं कर पाने के कारण रवींद्रनाथ ठाकुर की जगह रवींद्रनाथ टैगोर नाम से प्रसिद्ध हो गए. पिछले दिनों एक प्रसिद्ध लेखक ने गुरु टैगोर को ठाकुर कहा था, उनके ठाकुर कहने का मतलब था कि गुरु टैगोर क्षत्रिय थे.. संबधित लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान में पढ़ाते हैं, कितनी बिडम्बना है, कि गुरु टैगोर के बारे में यहां लोगों को बेसिक सी जानकारी भी नहीं है. जबकि गुरु टैगोर के बारे में पढ़ने लिखने वाले पूरी दुनिया के लोग उनके नाम एवं उनके साहित्यक योगदान के लिए याद करते हैं.
गुरु टैगोर का स्कूल में पढ़ने में मन भी नहीं लगता था, हमेशा स्कूल बदलते रहते थे. तब उनके बड़े भाई हेमेंद्र नाथ टैगोर ने उन्हें घर में ही पढ़ाया. विज्ञान, गणित, अंग्रेजी आदि विषयों की शिक्षा घर में ही मिली, वहीँ उन्होंने तैराकी, जूडो, कराटे, तैराकी आदि में भी पारंगतता हासिल की. वहीँ महान से महानतम संगीतकार उन्हें घर पर संगीत की शिक्षा देने आते थे, जिनमे जादूनाथ भट्टाचार्य भी थे. ये वही महान संगीतकार थे, जिन्होंने राष्ट्रगीत वन्दे मातरम को संगीतबद्ध किया था. 1873 में गुरु टैगोर 12 साल के हुए तब उनके पिता उन्हें आध्यात्मिक यात्रा पर ले गए, पहले शांतिनिकेतन में कुछ महीने तक रहे, वहीँ अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में एक महीने तक रहे स्वर्ण मंदिर में रहते हुए गुरुवाणी सुनते थे. इसके बाद डलहौजी में हिल स्टेशन में कुछ समय पर रहे जहां उनके पिता ने मॉडर्न साइंस, के साथ ही उपनिषद, पुराणों, बाल्मीकि रामायण आदि की शिक्षा ग्रहण करने के बाद आगे की शिक्षा लन्दन में ग्रहण की. स्कूल छोड़ देने वाले गुरु टैगोर की जीवन यात्रा वाकई रोमांचक है. भारतीय सिविल सर्विस का आज कितना क्रेज है, इसकी शुरुआत 1855 लन्दन में हुई. भारतीय छात्रों के लिए यह बहुत कठिन परीक्षा जिसकी पात्रता 23 साल थी, और यह परीक्षा लगभग 50 सालो तक लन्दन में ही आयोजित होती जिसका सिलेबस यूरोपीय था. वहीँ रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर पहले भारतीय थे जिन्होंने परीक्षा पास की. पिता की मर्ज़ी से गुरु टैगोर ने लन्दन से वक़ालत की पढ़ाई की और इंट्रेस्ट न होने से इसे छोड़ दिया, आज भी लन्दन में टैगोर लेक्चर सीरीज पढ़ाई जाती है. इसी दौरान गुरु टैगोर ने इंग्लिश लिटरेचर में तालीम हासिल करते हुए आइरिस, इंग्लिश म्युज़िक के साथ जुड़े. 13 साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखने वाले गुरु टैगोर की रचनाएं तब भी प्रकाशित होती थीं. रवींद्रनाथ टैगोर के संगीत के मुरीदों में स्वामी विवेकानंद भी थे, दोनों बहुत अच्छे मित्र होते हुए गुरु टैगोर ने स्वामी विवेकानंद को बहुतेरे गीत सिखाए, और विवेकानंद खूब गाते भी थे. कितना दिलचस्प दौर वो भी रहा होगा. शिक्षा, प्रतिभाएं हमेशा ही रोशन होती रहीं हैं साथ ही उन्होंने दुनिया को भी प्रकाशित किया है.
गुरु टैगोर ने अपनी संगीत की दुनिया ही रच डाली थी, जिसे रवींद्र संगीत के नाम से यह दुनिया जानती है. गुरु टैगोर के संगीत की ख़ासियत थी, उनका संगीत कई संगीत का संकलन होता था. जिसमें आइरिस संगीत , शास्त्रीय संगीत, कन्नड़ संगीत, आदि को मिलाकर रवींद्र संगीत का निर्माण करते थे. रवींद्र संगीत का कमाल यह भी है कि सन 1941 से शुरू हुआ हुआ संगीत सफ़र आज भी चल रहा है. गुरु टैगोर ने रवींद्र संगीत में हज़ारों मौलिक धुनों का निर्माण किया जो मौलिक थीं. जिसका प्रभाव बंगाली म्युज़िक सहित हिन्दी सिनेमा में इसका प्रभाव सबसे ज्यादा रहा है. बचपन से ही कहानियां लिखने वाले गुरु टैगोर ने काबुलीवाला जैसी प्रसिद्ध कहानियां लिखी, जिन पर कई भाषाओ में फ़िल्में बन चुकी हैं. ढेर सारे नॉवल लिखने वाले टैगोर की गीतांजलि यूरोप सहित अमेरिका में खूब प्रसिद्ध हुईं जिनका इंग्लिश में रूपान्तरण हुआ, और गुरु टैगोर पूरी विश्व में साहित्य की दुनिया के शिखर पर जा पहुंचे. गुरु टैगोर की रचनाएं हमेशा आज़ादी के इर्द गिर्द ही घूमती थीं. 1905 में जब अँग्रेजी सत्ता ने बंगाल का विभाजन कराया तब उन्होंने 'अमर शोनार बांग्ला' गीत लिखा था, जो बाद में बांग्लादेश ने अपने राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार कर लिया. गुरु टैगोर धर्मनिरपेक्षता के बहुत बड़े हिमायती थे, इससे उनकी भावनाएं समझी जा सकती हैं. उन्होंने हिन्दू - मुस्लिमों से आव्हान किया था कि एक-दूसरे के साथ मिलकर रक्षाबन्धन मनाएं जिससे सामाजिक सौहार्दपूर्ण वातावरण के साथ हिन्दुस्तान की एकता कायम रहे. इसी दौरान उन्होंने सामाजिक न्याय के लिए सबसे प्रसिद्ध गीत 'एकला चलो रे' लिखा मतलब न्याय की यात्रा में हमेशा चलते रहिए भले ही आप अकेले क्यों न हो हमेशा सत्य के लिए लड़ते रहिए. 1911 में जब टैगोर ने जनगणमन लिखा तब इसे पहली बार कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गाया गया था. बाद में महान फ़िल्मकार विमल रॉय ने अपनी फ़िल्म में उपयोग किया, उसी तर्ज़ उसी धुन पर देश का राष्ट्रगान बना.
1913 में नोबेल पुरस्कार सम्मान से सम्मानित होने वाले पहले एशियाई व्यक्ति बने गुरु टैगोर ने साहित्य की विधा में सम्मानित किए गए. ब्रिटिश सरकार भी गुरु टैगोर का काफ़ी सम्मान करती थी, सन 1915 में इन्हें नाइटहुड के टाइटल से सम्मानित किया, लेकिन 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हो गया, इसके विरोध में गुरु टैगोर ने नाइटहुड के टाइटल को वापस कर दिया. महात्मा गांधी जी हमारे राष्ट्रपिता आज पूरी दुनिया के लिए मानवता का सबक देते हैं साथ ही उनके आदर्श पूरी दुनिया के लिए पथ प्रदर्शन का काम करते हैं. गुरु टैगोर एवं गांधी जी भी अच्छे मित्र थे लेकिन उनके कुछ मतभेद भी थे. हालांकि गांधी जी तत्कालीन परिस्थितियों में देश की एकता के लिए राष्ट्रवादी विचारो के हिमायती थे, वहीँ गुरु टैगोर राष्ट्रवाद की विचारधारा के खिलाफ़ थे.
गुरु टैगोर कहते थे
- "राष्ट्रवाद की भावना आत्ममुग्धता की ओर ले जाएगी, हो सकता है इसके लिए लोग कट्टर हो जाएं और खुद को श्रेष्ठ मानकर पूरी दुनिया के सामने खुद को अव्वल मानने का ढोंग कर सकते है, कि हमारा मुल्क सबसे अच्छा है, और बांकी मुल्कों से नफ़रत करने लगे. हमें बताया गया कि एशिया एक आलीशान मकबरे के समान है, जो अपने मुर्दों में भी वैभव ढूँढता है. कहा गया कि एशिया कभी आगे नहीं बढ़ सकता क्योंकि इसका चेहरा ही पीछे की तरह झुका हुआ है. हमने इस इल्ज़ाम को स्वीकार भी कर लिया, इसमे विश्वास करने लगे. हम भूल गए कि एशिया में दर्शन शास्त्र, कला, विज्ञान, साहित्य, धर्म का विकास हुआ है. इसलिए ऐसा नहीं है कि यहां की हवा, मिट्टी, में ही ऐसा हो लोगों को आलसी बनाता हो, जो उन्नति करने से रोकता हो. जब पूरा पश्चिम अंधेरे में डूबा था तब पूर्व ने सदियों तक सभ्यता की मशाल जलाए रखी. एशिया के हिस्से काली रात आई. एशिया ने भविष्य को लेकर सोचना छोड़ दिया केवल और केवल अपने भूतकाल में ही जिंदा रहने लगा. यह निष्क्रियता मृत्यु के ही समान है". गुरु टैगोर की
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