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रूरल इंडिया

भिक्षाटन का समाज शास्त्र


  • 07/07/2024
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प्रियदर्शी रंजन, (लेखक आई ओ पी एफ फाउंडेशन के निदेशक हैं )

भारत की सभ्यता व संस्कृति में कभी गौरवपूर्ण स्थान रखने वाला भिक्षाटन आज कमजोर कड़ी साबित हो रहा है. भारत की सभ्यता व संस्कृति को अपमानित करने के लिए भिक्षाटन को मजबूत विषय माना जा रहा है. भिक्षाटन की विशेषताओं को समझे बगैर इसे समाप्त करने हेतु गाहे-बगाहे मुहिम चलाया जा रहा है.

भिक्षाटन न जाने कब, क्यों और किन-किन वजहों से भारतीय उपमहाद्वीप में हेय कार्य बन गया, न जाने कब इसमें अपराध के तत्व समाहित हो गए, न जाने कब यह नैतिक और सामाजिक तौर पर बहिष्कृत कर दिया गया, न जाने कब भिक्षाटन विशिष्ट से अशिष्ट और आडम्बर युक्त हो गया, न जाने कब यह केवल कुछ लोगों के लिए अपमानित कार्य और कुछ लोगो के लिए करुणा व कृपा का पात्र मात्र बन कर रह गया. हालत ऐसे हैं कि भारत की सभ्यता व संस्कृति में कभी गौरवपूर्ण स्थान रखने वाला भिक्षाटन आज कमजोर कड़ी साबित हो रहा है. भारत की सभ्यता व संस्कृति को अपमानित करने के लिए भिक्षाटन को मजबूत विषय माना जा रहा है. भिक्षाटन की विशेषताओं को समझे बगैर इसे समाप्त करने हेतु गाहे-बगाहे मुहिम चलाया जा रहा है. इसके पीछे यह नज़ीर पेश किया जा रहा है कि भारतीय उपमहाद्वीप के सिवाय अन्यत्र यह परम्परा नहीं है. विकसित देशों में तो बिल्कुल ही नहीं. भिक्षाटन की तस्वीर को भारत के अपमान के साथ जोड़ा रहा है.
   लेकिन स्याह सच इसके विपरीत है. भारत में भिक्षाटन कि परम्परा सिर्फ जीवको पार्जन का माध्यम नहीं रहा है. भारतीय सभ्यता, संस्कृति, रीति, परम्परा, शिक्षा, विज्ञान, ज्ञान, प्रज्ञा, धर्म, शास्त्र, कला आदि-आदि सभी को किसी अन्य की तुलना में कहीं अधिक सिंचित, पोषित, पल्वित करने का कार्य भिक्षाटन ने किया है. भारतीय सभ्यता, संस्कृति के आधार सतम्भ ऋषियों, मुनियों, संतों, साधुयों ने भिक्षाटन को आधार प्रदान किया है. भारत की वास्तविक शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल का आर्थिक आधार भिक्षाटन ही रहा है. यहाँ तक कि अवतार पुरुष कहे जाने वालों ने भी भिक्षाटन किया है. परशुराम, राम, कृष्ण से लेकर महवीर और बुद्ध तक ने भिक्षाटन के माध्यम से भारतीय दर्शन को सींचा है. बिना भिक्षाटन के भारतीय उपमहाद्वीप का हर किस्सा अधूरा है.  सिर्फ सनातन ही नहीं बल्कि भारत में मौजूद सभी धर्मों, सम्प्रदायों, परम्पराओं ने भिक्षाटन को बराबर का स्थान व सम्मान दिया है. भिक्षाटन ने भी बिना भेदभाव सभी के लिए अपनी उपयोगिता साबित किया है.
    भिक्षाटन का व्यवहारिक के साथ आध्यात्मिक महत्व भी है.  भिक्षाटन आध्यात्मिक चिकित्सा कि वह प्रक्रिया है जिससे अहंकार का नाश होता है और समाजिकता का भाव पैदा होता है. समाज में समरसता का भाव बनाये रखने के लिए भिक्षाटन को अनिवार्य मना गया है. मानवता के लिए भी भिक्षाटन अहम है. विश्व के अन्य हिस्सों में भले ही मानवतावाद का पिता पेट्रार्क को माना जाता है लेकिन भारत में इसके तत्व आदि काल से ही मौजूद है. सहयोग के लिए देखे-अनदेखे, ज्ञात-अज्ञात से भी मदद मांगना और देना मानवता है और यह सारे तत्व भिक्षाटन में व्याप्त है. भिक्षाटन एक तरफा सहयोग भी नहीं है. भारत में साधु-संतों के बीच परस्पर सहयोग होता है. कुछ शताब्दी पूर्व तक ग्रमीणो और भिक्षाटन करने वाले साधु-संतों के बीच परस्पर सहयोग था. ग्रामीण साधु-संतों का ख्याल भिक्षाटन द्वारा रखते थे वहीं साधु-संत अपने शोध, विचार, बाहरी दुनियां के ज्ञान आदि से अवगत कराते थे. यही कारण है कि भारत में बड़े उदेश्यों की पूर्ति में व्यापक व्यापक जनभागीदारी को सम्मलित करने हेतु भिक्षाटन किया जाता है. इससे लेने वाले को तो यह अहसास रहता ही है कि इसमें जनता की पूंजी भी लगी है, वहीं भिक्षा देने वालों को अधिकार प्राप्त हो जाता है की वह उस उक्त उद्देश्य में अपनी हिस्सेदारी मान ले.  वर्तमान में भी भिक्षाटन कि यह पद्धति बनी हुई है. बस उसका थोड़ा स्वरूप बदला है. राजनीतिक चंदा भी भिक्षाटन का ही एक प्रकार है. सामाजिक कार्यों कि पूर्ति हेतु कई बार चंदा संग्रह किया जाता. आज के दौर में  भिक्षाटन को चंदा शब्द ने आक्क्षादित कर लिया है. भारत की आज़ादी के दौरान गांधी समेत कई बड़े नेताओं ने भिक्षाटन किया था.
 जबकि आज यह तर्क पेश किया जाता है कि भिक्षाटन अब पेशा बन चुका है. इसमें अपराध के तत्व समाहित हो गया है. माना कि ऐसा हुवा है. लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि इस व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया जाये. देश के विभिन्न संस्थानों में भ्रष्टाचार व्याप्त है, तो क्या उन्हें समाप्त कर दिया जा रहा है? समाप्त करने कि बजाय उन्हें मूल रूप में शुद्ध रखने हेतु प्रयास किया जाता है.  उसी प्रकार भिक्षाटन को उसके मूल रूप में शुद्ध रखने की आवश्यकता है, न कि भिक्षाटन रीति को समाप्त करने की. उल्लेखनीय है कि सन् 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भिक्षुकों के मौलिक व मानवीय अधिकारों की रक्षा हेतु दायर दो याचिकाओं (हर्ष मंदेर बनाम भारत संघ और कार्निका शाहनी बनाम भारत संघ) पर सुनवाई में ‘भिक्षावृत्ति निरोधक कानून’, को खारिज करते हुए कहा था कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) एवं अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) के विरुद्ध है. केंद्र सरकार ने भी तब समर्थन में कहा था कि भिक्षावृत्ति अगर गरीबी के कारण की जा रही है तो इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए. हालाँकि भीख देने के बारे में कोई कानून नहीं है. भीख देना हमारे लिए संवैधानिक या विधिक दायित्व नहीं है लेकिन यह हमारा सामजिक और नैतिक जिम्मेवारी है. हर धर्मों, सम्प्रदायों, पंथों में दान के महत्व को समझाया गया है. और दान उस अवस्था में सबसे अधिक श्रेयस्कर है जब इसे जरूरत के लिए व जरूरत मंद व्यक्ति को प्रदान किया जाये.
 इसके बावजूद  भिक्षाटन के दर्शन को समझने हेतु अब भी हमारा नज़रिया संकीर्ण बना हुवा है. भिक्षाटन कि व्यापकता को समझने-समझाने हेतु नैतिक तौर पर चेतन होने की नितांत आवश्यकता है. भिक्षाटन करने वालों की समस्यायों को समझना होगा. सरकारी स्तर पर सिर्फ भिखारियों को भीख नहीं देने की अपील और भिक्षा से राष्ट्रीय छवि को नुकसान होता है कहने भर से इसे समाप्त नहीं क्या जा सकता.
    हां, व्यवसायिक और अपराधी प्रवृति के भिक्षावृति को अवश्य ही हत्तोसाहित  किया जाना चाहिए. लेकिन उसके लिए सरकारी प्रयास नाकाफी है. अभी तक देश में एकमुश्त आंकड़ा नहीं है की मजबूरन भीख मांगने वालों की असल संख्या क्या है. कुछ एक राज्यों को छोड़कर किसी सरकार के स्तर पर अलग से कोई ऐसी समर्पित योजना नहीं है जिससे भिखरियों को रोजी-रोजगार के स्तर पर पुनर्स्थापित किया जा सके. भिखारियों  को भविष्य में समाज की मुख्य धारा का हिस्सा बनाने के लिए जरुरी है कि उन्हें कौशल प्रशिक्षण दिया जाए. जागरूगता अभियान चलाया जाए. इसके अलावा भी यथासंभव प्रयास किया जाए.