भारत की 170 भाषाएं मिट जाने के कागार पर!

प्रियदर्शी रंजन की रिपोर्ट
भाषा, बोली मानव सभ्यता का प्रस्थान बिंदु है, भारतीय समाज जैसे-जैसे गांव से कटता गया, वैसे-वैसे उसकी भाषाएं सिमटती गई. हाल यह है कि देश की हजारों भाषाएं गुमनामी के गोद में अब अठखेलियां कर रही है. भाषा गायब हो रही है. आदमी अपनी भाषा की तलाश में हैं. भाषा पर एक खास रिपोर्ट
भारत को विविधताओं का देश कहने के पीछे पानी और वाणी की प्रकृति है. यहां एक कहावत है कि कोस-कोस पर पानी बदले और तीन कोस पर वाणी. लेकिन भारत की वाणी की प्रकृति वाली सभ्यताई व सांस्कृतिक विविधता खतरे में हैं. क्योंकि भारत की तीन कोस पर वाणी बदलने की प्रवृति विलुप्त होने के कगार पर है. संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने तो वर्ष 2019 में ही इंटरैक्टिव एटलस आॅफ द वर्ल्ड्स लैंग्वेजेज इन डेंजर में भारत की भाषाओं को पहला स्थान देकर इस भयावहता का रहस्योदघाटन कर दिया था. लेकिन स्थिति उससे भी भयावह है. भारत सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक साल 1961 की जनगणना के अनुसार यहां 1652 भाषाएं बोली जाती हैं जबकि हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में फिलहाल 1365 मातृभाषाएँ हैं. यूनेस्को के मुताबिक भारत की लगभग 170 भाषाएँ खतरे में हैं. जिन भाषाओं को इस संस्थान ने खतरे से बाहर रखा है उनमें से भी अधिकांश भाषाएँ आने वाले 10 सालों में खतरे में होंगी और इनका 30 से 50 सालों के भीतर विलुप्त होने का अनुमान है. खासकर उत्तर-पूर्व व उत्तर भारत तथा जनजातियों की भाषाएँ. खतरे में शामिल 170 में से आधे से अधिक उत्तर-पूर्व के प्रदेश की भाषाएँ हैं, जहां अंग्रेजी ने स्थानीय भाषाओं पर आधिपत्य स्थापित कर लिया है. मुख्यत: बिहार और कभी उसका अंग रहा झारखण्ड की कई प्राचीन व शास्त्रीय भाषाएँ खतरे के भयंकर प्रकोप में हैं. झारखण्ड की जनजातियों की प्राचीन भाषाओं में संथाली के सिवाय कोरवा, आसुरी व बिरहौरी यूनेस्को के विलुप्त होने वाली भाषाओं में शामिल है. इन तीन प्रमुख भाषाओं का अनुमानित बचा अस्तित्व मात्र 10 साल है. मांझी, कुड़माली, मुसासा, बिरहोर, चेरो, बिरजिया, तुरी जो की कभी बिहार में बोली जाने वाली वाणी थी आज इसका नाम कमोबेश भुला दिया गया है. उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बिहार या उत्तर भारत की भाषाओं का क्षरण सिर्फ बिहार के लिए चिंतनीय विषय नहीं है अपितु यह सम्पूर्ण भारत के लिए विचरणीय विषय है. क्योंकि प्राचीन भारत का स्वर्णिम इतिहास बिहार की धुरी पर स्थापित है. जिसे मगध या अन्य महाजनपद के नाम से जाना जाता था. भारत का स्वर्णिम काल खंड हो या विभिन्न महान पंथों, महान धर्मो का उद्गम या नवपरिवर्तन सबके के केंद्र में बिहार प्रमुखता से व्याप्त है. बिहार को बिसरना यानी भारत की स्वर्णिम सभ्यता, संस्कृति व इतिहास को बिसरना है. इसके बावजूद बिहार की अन्य प्रमुख भाषाएँ जिसे भारत की प्रमुख, प्राचीनतम तथा शास्त्रीय भाषा भी कह सकते हैं में शामिल मैथिली, भोजपुरी, मगधी, अंगिका व बज्जिका में से मगधी, अंगिका व बज्जिका अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है. यूनेस्को ने भाषाओं को खतरे में रखने का जो मानदंड तय किया है उस पर ये तीनो प्राचीन भाषाएँ खतरे में हैं. हालांकि इन भाषाओं को खतरे में सूचीबद्ध नहीं किया गया तो इसके पीछे इसका अभी करोड़ों लोगों द्वारा बोली का प्रयोग है. मागधी जो प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की भाषा थी, भगवान बुद्ध अपने उपदेश इसके प्राचीन रुप मागधी प्राकृत में ही देते थे उस भाषा ने अपने शास्त्रीयता को लगभग खो दिया है. जबकि इस भाषा का प्रभाव किसी समय में भारत की सीमाओं से बाहर श्रीलंका, चीन, कोरिया आदि देशों तक हुआ करता था. बज्जिका की प्राचीनता एवं गरिमा वैशाली गणतंत्र के साथ जुड़ी हुई है. वहीं अंगिका भाषा शब्द अंग से बना है. यह अंग प्राचीन महाजनपद होता था. अंगिका को लोग छेछा के नाम से भी जानते हैं. अंगिका की अपनी लिपि भी हुआ करती थी जिसे अंग लिपि कहते थे जो कि संरक्षण के आभाव में बिसर गया. जबकि भोजपुरी को बोलने वालों कि संख्या भारत की समृद्ध भाषाओं- बँगला, गुजराती और मराठी आदि बोलनेवालों से कम नहीं है. लेकिन भोजपुरी भाषा में निबद्ध साहित्य प्रचुर मात्रा में नहीं है. यही कारण है कि भोजपुरी लोकप्रिय होने के बाद भी शास्त्रीय भाषा नहीं बन पा रही है. बिहार कि इन तमाम भाषाओं में मैथिली भाषा हर पैमाने पर श्रेष्ठ है इसके बाद भी इसने अपनी लिपि मिथिलाक्षर का बजूद खो दिया है. मैथिली को अब देवनागरी लिपि में ही लिखा जाता है.
उल्लेखनीय है कि भाषा किसी समुदाय के अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनो के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. किसी भाषा का समृद्ध होना उस समुदाय या क्षेत्र के उस समय की बौद्धिक, सामाजिक, राजनातिक समृद्धि को दर्शता है. अतीत के लिहाज से जब किसी भी समुदाय की भाषा को नहीं जाना जाता है तो उस समुदाय के बारे में सही जानकारी भी नहीं मिल पाती है. आज भी सैंधव घाटी की लिपि को पूर्णतया नहीं पढ़ा जा सका है जिस वजह से उस कालखंड की सही-सही जानकारी अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है. जबकि वैदिक काल के कालखंड की संस्कृति स्मृति में रह जाने, वाणी में प्रयोग होने से आज भी अविस्मरणीय है. दरअसल, मातृभाषा का विलुप्त होना एक भाषा के विलुप्त होने भर नहीं होता है. भाषा विविधता और सांस्कृतिक विविधता अक्सर परस्पर जुड़ी होती हैं और भाषा की मृत्यु के साथ एक संस्कृति/उपसंस्कृति विलुप्त हो जाती है. एक भाषा की मृत्यु के साथ हम इसकी गुप्त प्रथाएँ, मौजूदा साहित्य, पर्यावरण ज्ञान, पैतृक दुनिया के विचारों के भविष्य की व्याख्या और सांस्कृतिक विरासत को खो देते हैं. यूनेस्को के पूर्व महानिदेशक कोइचिरो की टिप्पणियां हैं कि एक भाषा की मृत्यु अमूर्त सांस्कृति के कई रूपों को लुप्त होने की ओर ले जाती है. विरासत, विशेष रूप से परंपराओं की अमूल्य विरासत और मौखिक अभिव्यक्त इतिहास को नुकसान होता है. कविताओं और किंवदंतियों से लेकर कहावतों और चुटकुलों तक को नुकसान होता है. भाषाएँ मानवता की जैव विविधता की समझ के लिए भी आवश्यक हैं, क्योंकि वे बहुत कुछ संचारित करती हैं, प्रकृति और ब्रह्मांड के बारे में ज्ञान भी. निश्चित तौर यूनेस्को के पूर्व महानिदेशक कोइचिरो की ये टिप्पणियां भारत के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक हैं. दुनियां के सबसे प्राचीन सभ्यता व संस्कृति के पालनहारों में से एक भारत में सबसे अधिक मातृभाषाएँ विलुप्त हो रही हैं तो इसके साथ ही भारत की गौरवशाली विरासत भी विलुप्त हो रही है. यहां की प्राचीन गुप्त प्रथाएँ, साहित्य, पर्यावरण ज्ञान, पैतृक दुनिया के विचारों के भविष्य की व्याख्या भी बिसर रही है. हालांकि भारत में यूँ तो भाषाओं को संरक्षण हेतु संविधान में प्रावधान है. भाषाओं को सांविधानिक मान्यता देकर संरक्षण भी दिया गया है. राज्य के स्तर भी विभिन्न भाषाओं के संरक्षण हेतु अकादमी और आयोग का गठन किया जाता रहा है. लेकिन यूनेस्को और खुद भारत सरकार के ये आंकड़ें बता रहे हैं कि अबतक भाषाओं के संरक्षण हेतु किया गया प्रयास किस हद तक नाकाफी है. दिलचस्प यह कि भारत की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत को केवल 24,821 लोगों ही अपनी मातृभाषा बताते हैं. भारत की संस्कृति में अहम् योगदान देने वाले संस्कृत के साथ यह आंकड़ा वाकई दुखदाई है.
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