बम पिस्तौल से कभी क्रांति नहीं आती

दिलीप कुमार पाठक
कुछ महापुरुष कम समय के लिए ही सही धरती पर आते हैं और दुनिया को अपने आचरण से सिद्ध करते हैं कि आदमी का इस दुनिया में सिर्फ़ पैदा होकर मरने के लिए जीवन नहीं होता, बल्कि सिद्ध भी कर जाते हैं कि एक आदमी देश ही नहीं दुनिया की तारीख़ बदल देता है.. हमारे देश में एक से बढ़कर एक बहादुर महामानव पैदा हुए हैं, लेकिन जब भी देश में सबसे बहादुर इंसान का जिक्र होगा , महान शहीद ए आज़म भगत सिंह जी का नाम अग्रणी होगा. कहा जाता है हमारे भारतीय इतिहास में इनसे बहादुर इंसान पैदा ही नहीं हुआ, और न होगा. हमारे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगत सिंह जी क्रांतिकारी के साथ ही महान दार्शनिक इंसान थे. महान भगत सिंह जी खुद नास्तिक होते हुए भी ऐसे भारत की कल्पना करते थे, जहां हर धर्म जाति के लोग समानता के साथ अपना ख़ुशहाल जीवन व्यतीत करें. आज हमारे देश में भगत सिंह जी के टैटू, स्टीकर लगाकर घूमते हुए लोग मिल जाते हैं. नए- नए राष्ट्रवाद की नई परिभाषा रचने वाले भगत सिंह जी का नाम लेकर मार्क्सवादी लोगों को हेय की दृष्टि से देखने वालों ने वामपन्थ की विचारधारा, कम्युनिस्ट शब्द को एक गाली के रूप में प्रयोग करना शुरू किया हो, वहाँ नई पीढ़ी के लोगों को, युवाओं को शहीदे आज़म के विचार क्या खाक समझ आते होंगे?
आज के दौर में हमारे युवाओं के मन में शहीदे आज़म भगत सिंह जी काम नाम जेहन में आते ही सबसे पहले हथियार, हिंसा, दिमाग में आते हैं. लेकिन भगत सिंह जी को उन्हें अपने दौर का दार्शनिक इंसान माना जाता है. उनके दौर के दोस्तों का कहना था भगत सिंह बहुत ज्यादा अध्ययन करने वाले विचारशील इंसान थे. हमेशा उनके हाथ में कोई न कोई बौद्धिक पुस्तक होती थी. भगत सिंह जी ने भारतीय दर्शन के साथ यूरोपीय, अमेरिकन, ब्रिटिश, रसियन दर्शन साहित्य का खूब अध्ययन किया था. भगत सिंह जी ने अरेस्ट होने से पहले लगभग 300 बौध्दिक किताबों का अध्ययन किया था, वहीँ गिरफ्तार होने के बाद दो साल जेल में लगभग 300 किताबों का अध्ययन किया था. भगत सिंह अपनी लेखनी के लिए बहुत प्रसिद्ध थे, उस दौर पूरे देश की बड़ी - बड़ी मैग्ज़ीन 'अकाली, प्रताप, वीर अर्जुन, कीर्ति, आदि में उनके आर्टिकल्स प्रकाशित होते थे. महान भगत सिंह उच्चतम विचारों के प्रगतिशील विचारों से ओतप्रोत दार्शनिक क्रांतिकारी थे. आजकल नाटकों मंच आदि में भगत सिंह जी का अभिनय करते बच्चे मूँछों को तरेरते, हाथों में पिस्टल लहराते हैं, तब दुःख होता है कि एक महान दार्शनिक क्रान्तिकारी को उग्र विचारो वाला इंसान ही माना जाता है, एवं उनके विचारो पर कोई विमर्श ही नहीं करता... शहीदे आज़म भगत सिंह जी को समझना बहुत मुश्किल है.
महान भगत सिंह कहते थे -
"बम, और पिस्तौल, से क्रांति नहीं आती क्रांति की तलवार विचारों से तेज़ होती है, हिंसा कुछ दिनों के लिए प्रभावी हो सकती है, लेकिन विचार हमेशा अमर रहते हैं'. हिंसा के दम पर आप सफल हो भी सकते हैं लेकिन आप फ़िर से गिरेंगे यह भी तय है'.
आज अधिकांश लोग भगत सिंह जी का नाम लेकर हिंसा को प्रमोट करते हैं. एक महान दार्शनिक क्रांतिकारी को हिंसक विचार वाला क्रांतिकारी बनाने में तुले रहते हैं. भगत सिंह वसुधैव कुटुम्बकम यानि विश्व हमारा परिवार है, समाजवाद, नास्तिकता जैसी विचारधारा को मानते थे. इसीलिए शहीदे आज़म कार्ल मार्क्स, ब्लादिमीर लेनिन, आदि से ख़ासे प्रभावित थे. किसानो, मजदूरों को सामाजिक भेदभावपूर्ण जीवन जीते हुए देखकर बहुत दुखी होते थे. वे समाज के निचले स्तर पर ज़िन्दगी जी रहे लोगों के लिए आवाज़ उठाना चाहते थे, लड़ना चाहते थे. उनकी इस विचारधारा को समझने के लिए समझा जा सकता है जब उन्होंने एक अवॉर्ड विनिंग आर्टिकल में गुरु गोविंद सिंह जी को याद करते हुए लिखा था --- "सूरा सो पहिचानिए जो लड़े दीन के हित पुर्जा - पुर्जा कट मरे कभू न छड़े खेत"... कहने का मतलब है बहादुर वही है जो कमज़ोर, दुःखी लोगों के लिए लड़ता रहे , भले ही लड़ते हुए खुद मिट जाए. आज़ादी से पूर्व हमारे सभी क्रांतिकारियों का प्राथमिकताओं में आज़ादी ही थी. सामाजिक न्याय की बात तो बाद में भी की जा सकती थी, लेकिन भगत सिंह इससे भी पहले सामाजिक न्याय की बात को ज़ोर देते थे. भगत सिंह का मानना था जब आदमी के साथ व्यक्तिगत रूप से अन्याय होता है, तो एक मज़दूर, किसान को उससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि शासन किसका है, फिर चाहे ब्रिटिश राज हो या भारत का.. भूखे व्यक्ति का स्वतन्त्रता, ग़ुलामी आदि से क्या लेना देना. शोषण को शोषण ही कहा जाएगा चाहे करने वाला कोई भी हो. मज़दूरो, किसानो की ज़िन्दगी में कोई परिवर्तन नहीं आएगा जब तक सामाजिक सुरक्षा, न्याय की तरजीह न दी जाए. भगत सिंह चाहते थे, भारत की आज़ादी के साथ सामाजिक न्याय की बात की जाए, क्योंकि सत्ता परिवर्तन से देश नहीं बदलेगा. उन्होंने इसके लिए एक पार्टी भी बनाई थी, उनकी पार्टी का नाम था 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' बाद में भगत सिंह, एवं चंद्रशेखर आज़ाद ने इसी में सोशलिस्ट शब्द जोड़ दिया. भगत सिंह अपनी सामाजिक न्याय की परिभाषा के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं करते थे और न ही वो भूलते थे. जब असेंबली में उन्होंने बम गिराए थे, तब शहीदे आज़म एवं बटुकेश्वर दत्त दोनों ने तीन नारे लगाए थे. इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद का नाश हो, सामाजिक क्रांति.. आदि उनके प्रसिद्ध नारे थे. ग़ुलामी के दौर में पैदा होने वाले शहीदे आज़म वसुधैव कुटुम्बकम यानि विश्व एक परिवार है, जैसी महान विचारधारा में यक़ीन करते थे. भगत सिंह ने एक लेख लिखा था 'विश्व प्रेम' जिसे उनके शहीद होने के बाद 1942 कोलकाता की मैग्जीन मतवाला में प्रकाशित किया गया था.
शहीदे आज़म ने लिखा
"वसुधैव कुटुम्बकम यानि विश्व एक परिवार है, यह कितना सुन्दर महान आदर्श है, हर किसी को अपना हो जाने दो, कोई भी अजनबी न हो, वह कितना सुन्दर दौर होगा जब दुनिया से पराएपन का भाव मिट जाएगा. जिस दिन दुनिया में यह सुन्दर आदर्श स्थापित होंगे, उस दिन कह सकेंगे इस दुनिया ने अपनी ऊंचाई को छू लिया है. इस आर्टिकल में वसुधैव कुटुम्बकम जैसी विचारधारा को लिखने वाले विद्वान व्यक्ति को भगत सिंह बहुत साराहते हैं. जिन्हें सामाजिक जीवन की साधारण बातेँ भी नहीं पता वो राष्ट्रवाद जैसे बड़े-बड़े शब्दों का उपयोग करते हैं, जबकि बड़े से बड़े दार्शनिकों ने इस शब्द को मह्त्व ही नहीं दिया.. आज के दौर में बहुतेरे लोग इस क्षुब्ध राष्ट्रवाद जैसे शब्द का खूब उपयोग करते हुए विपरीत विचारो के लोगों को क्रिटिसाईज करते हुए नीचा दिखाते हैं, देखा जाए तो वो लोग न गाँधी जी को समझ पाए न भगत सिंह जी को न गुरु टैगोर, न ही पंडित नेहरू जी को क्यों कि सभी दार्शनिक क्रांतिकारी इस शब्द को उपयोगी नहीं मानते थे. आज के ऐसे लोग संकीर्णतावादी सोच से ग्रसित हो चुके हैं. ये वैसे ही मानसिकता के लोग होते हैं जो खुद को सर्वश्रेष्ठ मानकर दूसरे मुल्कों को नीचा दिखाते हैं. जैसे आज भारत - पाकिस्तान, चीन - भारत की दुश्मनी है, भगत सिंह जी के दौर में अमेरिका - जापान, एवं फ्रांस - जर्मनी के बीच में खूब दुश्मनी थी, उस दौर के भगत सिंह का ख्वाब था "दुनिया आदर्श जब मानी जाएगी जब अमेरिका जापान एक दूसरे से दुश्मनी छोड़कर एक दूसरे का सम्मान करते हुए, एक दूसरे का सम्मान करेंगे, वहीँ जर्मनी एवं फ्रांस एक दूसरे को मित्रता की दृष्टि से देखेंगे. वहीँ ब्रिटेन भारत को एक आज़ाद मुल्क मानकर जब भारत सम्मान के साथ ब्रिटेन के साथ स्पर्धा करेगा. ग़ुलामी के दौर में भी भगत सिंह ब्रिटेन को गुलाम होने की कामना नहीं करते थे. बल्कि वो कामना करते थे, दुनिया एक दूसरे की इज्ज़त करते हुए स्पर्धा करते हुए आगे बढ़े. शहीदे आज़म के ऐसे उच्चतम विचार आज की दुनिया के लिए भी प्रासंगिक है, और रहेंगे. शहीदे आज़म महात्मा गांधी जी से प्रेरित होकर ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बनने की सोचकर देश की आज़ादी की लड़ाई में उतरे थे. भगत सिंह, 'गांधी जी' को अपना लीडर, मार्गदर्शक मानते थे, साथ ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस, एवं पण्डित जवाहर लाल नेहरू जी से काफ़ी प्रभावित थे. सन 1928 में भगत सिंह ने कीर्ति मैग्जीन में एक आर्टिकल लिखा था, आर्टिकल का नाम था 'नए नेताओं के विचार' इस आर्टिकल में भगत सिंह पंडित नेहरू जी, एवं नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं "भगत सिंह नेताजी को इमोशनल बंगाली कहते हुए लिखते हैं सुभाष चंद्र बोस देश की ख़ूबसूरती को रोमांटिसिज्म कर रहे हैं, उन्होंने इसे भावुकता कह कर खारिज कर दिया. वहीँ तर्कसंगत बात पर नेहरूजी के भाषण से तुलना करते हुए नेहरू जी की बात से सहमत हुए "पंडित जवाहर लाल नेहरू कहते हैं 'जिस देश में जाओ वो सोचता है कि वो किसी दूसरे देश से खास है, वहीँ उसका दुनिया के लिए एक संदेश है, जैसे ब्रिटेन दुनिया को संस्कृति सिखाने का ठेकेदार बनता है. भगत सिंह जी का मानना था ज़रूरी नहीं है कि हम एक - दूसरे से सहमत ही हों, एक दूसरे से असहमति का भी स्वागत होना चाहिए, जो बात न्यायोचित न हो उस बात को नहीं मानना चाहिए, चाहे वेद, पुराण, कुरान, बाइबिल ही क्यों न कहें.
समतावादी विचारों को मुखरता से उठाने वाले भगत सिंह 1927 में अपने लिखने वाले आर्टिकल में जिक्र करते हैं - "दुनिया के सभी गरीब लो
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