फिर सरकार नई, हालात वही!

संजय झा, एडिटर इन चीफ
कोट. नोट. वोट. चोट. खोट ये लोकतंत्र का आधुनिक सूत्रवाक्य है. वोट का एक अपना पहाड़ा है. एक-एके नारा. दो-दुनी चारा. तीन-तिया जाति. चार-चौके धर्म. पांच-पचे डर. छह-छक्के विज्ञापन. सात-सत्ते आश्वासन. आठ-आठे भाषण. नौ-नौवे राशन. दस-दहेके अब बस. सवाल है तो सबको जवाब चाहिए.
वोट दिया क्या आपने? अच्छा, कब से दे रहे हैं वोट? कितने साल हो गये आपको वोट देते-देते? वोट देकर क्या मिला आपको? वादे, दावे, नारे, आश्वासन और न जाने क्या-क्या? सुनिये, वोट देते रहिये. भाषण सुनते रहिये. भाषण से सेहत बनता है. अरे बाबा, कितना भाषण, कितना आश्वासन, कितने नारे, कितने स्लोगन. मेरा तो दिमाग फटा जा रहा है. सब निजाम बदलने में लगे हैं. समाज बदलने में लगे हैं. विकास हो रहा है. कहा तो यही जा रहा है. तो देते रहिये वोट विकास होगा. देश में चुनाव सत्ता का एक महोत्सव है. साफ-साफ बोले तो चुनाव जाति-धर्म का एक उत्सव है. एक अनुष्ठान है. इससे सत्ता सजती है. आपके और हमारे सपने संवरते हैं. यही तो हो रहा है. अवाम का अंतहीन सपने हैं. सवाल दर सवाल हैं. सुन रहे हैं आपलोग कि वोट से, चुनाव से बदल रहे हैं न आपके हालात. दिल पे रख के हाथ कहिये कि सब ठीक है न! आजादी मिली. लोकतंत्र का चुनाव होना शुरू हुआ. अबतक 18 बार चुनाव हो चुके हैं. सरकारें आती हैं जाती हैं. बदलाव के सपने सब देखते हैं. बस देखते ही रह जाते हैं. जरा ठहरकर सोचियेगा कि आखिर हमारे आपके वोट का मतलब क्या है? क्या बदलाव हो गये? सड़क, पुल, अस्पताल, स्वास्थय, शिक्षा, रोजगार मिल भी गये तो क्या हुआ? ये तो हर सरकार का बुनियादी कार्य हैं. असल सवाल तो ये है कि आपके हालात बदले या नहीं. प्रति व्यक्ति आय में कोई इजाफा हुआ या नहीं. खुशहाली आयी या नहीं. पांच किलो अनाज में किलो-किलो वोट हमसब देते रहे तो आपके आंखों की पथरायी हुयी सपने जमीन पर उतरा या नहीं. अपने-आप से ये सवाल पूछियेगा जरूर. धंधा कोई हो उसका भी धर्म होता है. यहां तो बिना धर्म का धंधा चल रहा है. और इस धंधे के सूत्रधार हम और आप सब के सब हैं. तो करिये जयघोष. लोकतंत्र चल रहा है. बस वोट देते रहिये, सरकार बनानी है.
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