देश में 1992 के बाद से ही बना हुआ है बौद्धिक संकट!

प्रख्यात संपादक आनंद स्वरूप वर्मा से खास बातचीत
महज तीस साल पहले की बात है जब दो पत्रकारों की पहल पर दिल्ली से पांच दर्जन लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी ट्रेन पकड़ कर प्रतिरोध मार्च निकालने लखनऊ निकल लिए थे. यह 6 दिसंबर, 1992 के ठीक दो हफ्ते बाद हुआ था. सारे अखबारों ने इस प्रतिरोध और सभा की कवरेज की थी.
Q. बाबरी विध्वंस के बाद दिल्ली से पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों का एक दल प्रतिरोध में लखनऊ गया था. इस बारे में सिलसिलेवार बताइए. शुरुआत कैसे हुई?
A.जब बाबरी विध्वंस की सूचना मिली तो मैं इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर गया. वहां राजेश जोशी और मैं पास के एक ढाबे पर बैठे. हम लोगों ने प्लान किया कि इस घटना के खिलाफ हम लोगों को कुछ करना चाहिए. क्या करना चाहिए? हम लोग ये नहीं चाहते थे कि अल्पसंख्यक समुदाय इससे इतना ज्यादा डर जाए, इतना वातावरण सांप्रदायिक हो जाए कि उसके अंदर असुरक्षा की भावना पैदा हो जाए. इसको हम लोग रोकना चाहते थे.
Q. उस समय अल्पसंख्यक पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का क्या रिएक्शन था? उनसे कोई बात हुई थी?
A. तुरंत तो नहीं, लेकिन शाम तक तो बात हो ही गई थी उन लोगों से. उन लोगों के अंदर भी जो भरोसा था, उनके समुदाय के बाहर की डेमोक्रेटिक ताकतों पर ही ज्यादा था और हम लोग इसको समझ भी रहे थे. उनके भीतर की डेमोक्रेटिक ताकतों की आवाज तो कहीं सुनी नहीं जा रही थी, लेकिन हम लोगों की आवाज सुनी जा सकती थी. यह सोचकर ये हुआ कि दिल्ली में एक मार्च निकाला जाए. अभी हम दो ही लोग बात कर रहे थे. अंत में ये तय हुआ कि अयोध्या उत्तर प्रदेश में है और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ है, तो लखनऊ चला जाए और वहां मार्च निकाला जाए. फिर ये हुआ कि कितने लोग जाएंगे, तो कहा गया कि ठीक है, ज्यादा से ज्यादा लोगों से संपर्क किया जाएगा. ये बात है उन्नीस सौ बानबे की. उस समय तक हम लोगों में से किसी के पास मोबाइल फोन वगैरह नहीं था, लेकिन ये था कि कोई भी घटना अगर होती थी… तो लोग सजग रहते थे. एक-दूसरे के सरोकार में सबकी भागीदारी दिखती थी.
Q. तो सब लोग ट्रेन से गए? एक साथ टिकट हुआ सबका? आने-जाने का?
A. सब लोग ट्रेन से गए. सबका टिकट कराया हम लोगों के मित्र अनिल चौधरी जी ने… उन्होंने कहा कि इसकी जिम्मेदारी मैं ले लेता हूं. सबका टिकट उन्होंने करवाया, लखनऊ मेल से. जो लोग अपना पैसा दे सकते थे उन्होंने दिया. कुछ लोगों ने कहा बाद में दे देंगे, कुछ लोग बिलकुल देने की स्थिति में नहीं थे. वो सब मैनेज किया अनिल चौधरी ने, कहा कि ठीक है अभी टिकट कर लेते हैं, फिर जो लोग पैसे देते जाएंगे बाद में एडजस्ट हो जाएगा. और वहां के जो पत्रकार थे, लखनऊ के, उन लोगों ने कहा कि हम लोग यहां की व्यवस्था करते हैं. जाने वालों में सभी वे नाम थे जिन्हें महत्वपूर्ण समझा जाता था– राजेंद्र यादव, एसपी सिंह, अशोक चक्रधर, पंकज सिंह, पुरुषोत्तम अग्रवाल, सीमा मुस्तफा, पंकज बिष्ट, अनिल चमड़िया, राजेश जोशी, जावेद नकवी, अनिल चौधरी, देवी प्रसाद मिश्र, डी प्रेमपति जैसे बहुत सारे नाम थे. कुलदीप नैयर भी जाने वालों में थे लेकिन ऐन मौके पर तबीयत खराब हो जाने की वजह से वह नहीं जा सके.
Q. कौन-कौन थे लखनऊ के मुख्य पत्रकार?
A. रामकृपाल सिंह थे, रविंदर सिंह थे, और आदियोग थे… जहां तक मुझे याद आ रहा है, लेकिन रविंदर सिंह तो थे. मुझे लगता है रामकृपाल भी थे. मुद्राराक्षस उस समय चले गए थे लखनऊ, वो भी थे. और एक विद्यासागर जी थे, उनकी डेथ हो गई. स्वतंत्र भारत के एक और पत्रकार थे गुरदेव नारायण सिंह. इन लोगों ने कहा हम व्यवस्था करवाएंगे. उन लोगों ने वहां के कुछ गेस्ट हाउसेज में, एक-दो सरकारी गेस्ट हाउस थे, उसमें व्यवस्था कर दी थी. पत्रकारों की वजह से थोड़ी सहूलियत हो गई थी ठहरने के लिए. स्टेशन पर गाडि़यां आई थीं हम लोगों को ले जाने के लिए, उन पत्रकारों ने ही व्यवस्था की थी. उसमें से एक गाड़ी में वो लगा हुआ था… लाल… लाल बत्ती लगी थी. तो एसपी सिंह, सुरेंद्र प्रताप सिंह, जो हम लोगों के साथ ही गए थे ट्रेन से, उन्होंने कहा कि इस तरह की गाड़ी से हम लोग नहीं जाएंगे. तो उस गाड़ी को हटवाया गया. और कांग्रेस के लोगों ने… नारायण दत्त तिवारी ने एक संदेश भेजा था कि सबके लिए खाने की हम व्यवस्था करना चाहेंगे. तो हम लोगों ने मना कर दिया, कि नहीं, किसी पज्ञॅलिटिकल पार्टी से हम कुछ नहीं लेंगे.
Q. तो उन लोगों को सूचना थी? कांग्रेस को और बाकी पार्टियों को?
A. हां हां, खबर छपी थी न… ये सारी खबर छपी थी कि हम लोग जा रहे हैं. यूपी के अखबारों में भी छपी थी… ये है न- ‘लखनऊ में सांप्रदायिकता के खिलाफ जनमत बनाएंगे दिल्ली के बुद्धिजीवी’. तो ये बड़ी खबर थी, और जनसत्ता तो काफी पढ़ा जाता था, और लखनऊ के अखबारों में भी… देखिए, उस समय मीडिया… बता तो रहे हैं… मीडिया की ऐसी स्थिति थी कि मीडिया का बहुत समर्थन मिला. अगर मीडिया का समर्थन नहीं मिला होता तो ये मार्च इतना सफल नहीं होता. ऐसा माहौल उस समय था और यह केवल लखनऊ में ही नहीं, आप उस समय के अखबारों को उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि देश के विभिन्न शहरों में मस्जिद गिराए जाने के विरोध में लोगों ने प्रदर्शन आयोजित किए थे. मस्जिद गिराए जाने के पक्ष में किसी भी प्रदर्शन की खबर नहीं दिखाई देगी क्योंकि वे लोग सकते में थे लेकिन विरोध में बहुत सारे प्रदर्शनों की खबरें आपको मिल जाएंगी. इन प्रदर्शनों में लेखकों के साथ-साथ प्रबुद्ध नागरिकों की जबरदस्त हिस्सेदारी थी.
Q. तो आप लोगों का अयोध्या जाने का कोई प्लान नहीं था?
A. हां, अयोध्या जाने का नहीं था. प्लान ये था कि हम लोग लखनऊ में ही एक बड़ा वो करेंगे, और लखनऊ में एक प्रस्ताव पारित करेंगे. उसको लखनऊ प्रस्ताव के नाम से चारों तरफ प्रचारित करेंगे. जितना हो सके उतना किया भी गया, लेकिन वह एक बड़ी घटना थी क्योंकि पंद्रह दिन के अंदर… मतलब, ये 18 दिसंबर की खबर है, 20 दिसंबर को हम लोग लखनऊ पहुंच गए थे और 6 दिसंबर को ढांचा गिराया गया था… तो दो हफ्ते में हम लोग पहुंच गए थे. तो इसका एक असर तो रहा, कि सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए जबकि बहुत सारे लोग चाहते थे. इसलिए ऐसा नहीं था कि उसकी वजह से पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे हुए हों. नहीं… कहीं-कहीं हुए जहां जान बूझ कर के कराया गया, लेकिन सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए. और सबसे बड़ी बात ये थी कि उस मीटिंग में … और यही वजह रही कि बाद में जब इकॉनमी खोली गई, तो लिबरलिज्म का सवाल साइडलाइन हो गया और लेफ्ट की पार्टियों ने सेकुलरिज्म के मसले पर कांग्रेस का साथ दे दिया?
Q. यूपी के बाहर से भी लोग आए थे?
A. नहीं, हम लोगों ने जान-बूझ कर के इतना नहीं किया क्योंकि फिर आयोजकों के ऊपर एक जिम्मेदारी बढ़ जाती। हमारे पास इतने संसाधन नहीं थे। बस ऐसे ही हम लोगों ने… ऐसे ही प्लान बना लिया। वो तो अगर अनिल चौधरी ने मदद नहीं की होती तो काफी दिक्कत आई होती टिकट वगैरह में भी, क्योंकि प्लान तो बना लिया… ये नहीं था कि कैसे होगा, कैसे और खर्च होंगे… खर्च तो होते हैं….
देखिए, ये मार्च की तस्वीर है। इसमें ये हैं पंकज सिंह, ये विद्यासागर जी, सुरेंद्र प्रताप सिंह, मुद्राराक्षस, फिर ये मैं हूं, पीछे ये भी वहीं के एक पत्रकार हैं, लखनऊ के, नाम नहीं याद आ रहा….
अभी कुछ लोग जो जीवित हैं, उनमें कुछ लोग पहचान में आ जाएं…।...
ये वहां के एक रंगकर्मी हैं, शायद आत्मजीत हैं, लखनऊ के। ये वीरेंद्र यादव हैं। जुलूस काफी लंबा था। ये था तो वैसे बुद्धिजीवियों का ही लेकिन इसमें मोटे तौर पर बहुत सारे ऐसे लोग शामिल थे जिनको बुद्धिजीवी की कैटेगरी में नहीं रखते लेकिन जनता के बीच काम करने वाले लोग थे। ये हैं…
किसकी तुलना करते थे हिटलर से… कोई व्यक्ति तो था नहीं…
भाजपा की… (हंसते हुए)… कोई व्यक्ति नहीं था, हिटलरशाही जो है…।
Q. मार्च निकलने के बाद और राजनीतिक दलों या संगठनों की ओर से कोई रिएक्शन आया?
A. हां, उसके बाद ये हुआ कि ये जितने… जन संस्कृति मंच, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, इन लोगों के बीच में एक एकता कायम हुई और तीनों के दो-तीन संयुक्त कार्यक्रम हुए। करीब एक साल तक कुछ न कुछ चलता रहा। फिर जो पहली बरसी हुई 1993 में मस्जिद गिराये जाने की,
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