देश में नहीं है कोई धंधा सिर्फ, बेरोजगारी का फंदा

हाल ही में मानव विकास संस्थान और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भारत रोजगार रिपोर्ट 2024 शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जो इस बात पर प्रकाश डालती है कि भारत के युवा बढ़ती बेरोजगारी दर से जूझ रहे है.
बेरोजगारी विस्फोट से सामाजिक तनाव चर्चा में क्यों?
1998 में मानव विकास संस्थान की स्थापना इंडियन सोसाइटी आॅफ लेबर इकोनॉमिक्स के तत्त्वावधान में की गई थी, यह एक गैर-लाभकारी स्वायत्त संस्थान है जिसका उद्देश्य एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान देना है जो समावेशी विकास को बढ़ावा देता है और एक समावेशी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था को महत्त्व देता है जो गरीबी एवं अभावों से मुक्त हो.
रोजगार की खराब स्थितियां
- समग्र श्रम बल भागीदारी और रोजगार दरों में सुधार के बावजूद, भारत में रोजगार की स्थिति खराब बनी हुई है, जिसमें स्थिर या घटती मजदूरी, महिलाओं के बीच स्व-रोजगार में वृद्धि एवं युवाओं के बीच अवैतनिक पारिवारिक काम का उच्च अनुपात जैसे मुद्दे शामिल हैं.
- भारत के बेरोजगार कार्यबल में लगभग 83% युवा हैं और कुल बेरोजगारों में माध्यमिक या उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की हिस्सेदारी वर्ष 2000 में 35.2% से लगभग दोगुनी होकर वर्ष 2022 में 65.7% हो गई है.
युवा रोजगार चुनौतियां
- 2000 और वर्ष 2019 के बीच युवा रोजगार तथा अल्परोजगार में वृद्धि हुई, शिक्षित युवाओं को बेरोजगारी के उच्च स्तर का अनुभव हुआ.
- श्रम बल भागीदारी दर, श्रमिक जनसंख्या अनुपात और बेरोजगारी दर में वर्ष 2000 तथा वर्ष 2018 के बीच दीर्घकालिक गिरावट देखी गई लेकिन वर्ष 2019 के बाद सुधार देखा गया.
- यह सुधार दो शीर्ष कोविड-19 तिमाहियों को छोड़कर, कोविड-19 से पहले और बाद में आर्थिक संकट की अवधि के साथ मेल खाता है.
विरोधाभासी सुधार...
2018 से पहले कृषि रोजगार की तुलना में गैर-कृषि रोजगार तेजी से बढ़ने के बावजूद, गैर-कृषि क्षेत्र कृषि से श्रमिकों को अवशोषित करने के लिये पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुए हैं.
भारत में बेरोजगारी?
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के आँकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2021 में भारत की बेरोजगारी दर बीते चार महीने के उच्चतम 7.9% पर पहुँच गई है. ओमिक्रॉन वेरिएंट से उत्पन्न खतरे के बीच कोविड-19 के मामलों में हुई बढ़ोतरी और कई राज्यों में लागू नए प्रतिबंधों के कारण आर्थिक गतिविधि और खपत का स्तर प्रभावित हुआ है. यह भविष्य में आर्थिक सुधार पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है...
बेरोजगारी के प्रकार
- प्रच्छन्न बेरोजगारी: यह एक ऐसी घटना है जिसमें वास्तव में आवश्यकता से अधिक लोगों को रोजगार दिया जाता है.
- 8 यह मुख्य रूप से भारत के कृषि और असंगठित क्षेत्रों में पाई जाती है.
- मौसमी बेरोजगारी: यह एक प्रकार की बेरोजगारी है, जो वर्ष के कुछ निश्चित मौसमों के दौरान देखी जाती है.
- 8 भारत में खेतिहर मजदूरों के पास वर्ष भर काफी कम काम होता है.
- घर्षण बेरोजगारी: घर्षण बेरोजगारी का आशय ऐसी स्थिति से है, जब कोई व्यक्ति नई नौकरी की तलाश कर रहा होता है या नौकरियों के बीच स्विच कर रहा होता है, तो यह नौकरियों के बीच समय अंतराल को संदर्भित करता है.
- 8 दूसरे शब्दों में, एक कर्मचारी को एक नई नौकरी खोजने या एक नई नौकरी में स्थानांतरित करने के लिये समय की आवश्यकता होती है, यह अपरिहार्य समय की देरी घर्षण बेरोजगारी का कारण बनती है.
बेरोजगारी के विषय में
किसी व्यक्ति द्वारा सक्रियता से रोजगार की तलाश किये जाने के बावजूद जब उसे काम नहीं मिल पाता तो यह अवस्था बेरोजगारी कहलाती है
- बेरोजगारी का मतलब: अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के मापक के रूप में किया जाता है.
- बेरोजगारी को सामान्यत बेरोजगारी दर के रूप में मापा जाता है, जिसे श्रमबल में शामिल व्यक्तियों की संख्या में से बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या को भाग देकर प्राप्त किया जाता है.
- संरचनात्मक बेरोजगारी: यह बाजार में उपलब्ध नौकरियों और श्रमिकों के कौशल के बीच असंतुलन होने से उत्पन्न बेरोजगारी की एक श्रेणी है. भारत में बहुत से लोगों को आवश्यक कौशल की कमी के कारण नौकरी नहीं मिलती है और शिक्षा के खराब स्तर के कारण उन्हें प्रशिक्षित करना मुश्किल हो जाता है.
- चक्रीय बेरोजगारी: यह व्यापार चक्र का परिणाम है, जहाँ मंदी के दौरान बेरोजगारी बढ़ती है और आर्थिक विकास के साथ घटती है.
- भारत में चक्रीय बेरोजगारी के आँकड़े नगण्य हैं। यह एक ऐसी घटना है जो अधिकतर पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में पाई जाती है।
- तकनीकी बेरोजगारी: यह प्रौद्योगिकी में बदलाव के कारण नौकरियों का नुकसान है।
2016 में विश्व बैंक के आँकड़ों ने भविष्यवाणी की थी कि भारत में आॅटोमेशन से खतरे में पड़ी नौकरियों का अनुपात साल-दर-साल 69% है.
2012-22 के दौरान आकस्मिक मजदूरों की मजदूरी में मामूली वृद्धि का रुझान बना रहा, नियमित श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी या तो स्थिर रही या गिरावट आई. वर्ष 2019 के बाद स्व-रोजगार की वास्तविक कमाई में भी गिरावट आई.
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