झारखंड के जंगल में धार्मिक लफंगों का ‘खेला’

कृपाशंकर, कंटेंट एडिटर
हां, धर्म के नाम पर और पेड़ तस्करी के काम पर जंगल का जंगल खत्म किया जा सकता है, उसे उजाड़ा जा सकता है. आप देख सकते हैं, सखुआ-साल के लगभग सभी पेड़ों को सनातनी धर्म के चोंगे में रंगा-पुता जा चुका है...
जगल है. जंगल में दरख़्त हैं , घने-घने , सटे-सटे ... कीमत बेशुमार ! साल-सखुआ के हैं, सबकी पसंद! यह टूटता नहीं, खोखड़ नहीं होता , कीड़े _ मकोड़े नहीं लगते. दरवाजे-खिड़कियों में लग जाएं तो खूबसूरती दिखती है अलग से. बाजार में इसकी मांग ज्यादा है. लिहाजा, लकड़ी तस्करों ने इसे निशाना बना रखा है. यह लकड़ी झारखंड के जंगलों में ज्यादा पाया जाता है. इन पेड़ों पर आदिवासियों के कोई अधिकार नहीं हैं. वे पेड़ों के सूखी टहनियां क्या, पत्ते भी नहीं तोड़ सकते. जुर्म है और सजा सख्त! हां , धर्म के नाम पर और पेड़ तस्करी के काम पर जंगल का जंगल खत्म किया जा सकता है, उसे उजाड़ा जा सकता है. आप देख सकते हैं, सखुआ-साल के लगभग सभी पेड़ों को सनातनी धर्म के चोंगे में रंगा-पुता जा चुका है. साफ समझ लें, यह लकड़ी तस्करों के हो चुके हैं, दूसरे धर्म के लोग न काटें. तस्करों में खूनी जंग चलते रहते हैं. यह नए सियासत के नए रंग और ढंग हैं, जिसको अपने कैमरे में बहुत ही बारीकी से पकड़ा गया है.
आप भी देखिये जंगल पर धार्मिक उन्मादियों का हमला...
पर्यावरण बचें तो बचें कैसे? जंगल को आदमी से खतरा है. बेजुबान पेड़-पौधे भले ही कुछ न बोल पाते हैं लेकिन सच तो यही है कि हिंसक आदमी कुल्हाड़ी लेकर खड़ा है.
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